25 जून 1975 को अपनी सत्ता बचाने के लिए लोकशाही की स्वतंत्र आवाज का दबाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा विपक्ष के सभी प्रमुख नेताओं को गुपचुप तरीके से जेल में डालने तथा वाक स्वतंत्रता को बाध्य करने के लिए समस्त देश में आपातकाल लगाने से सारा देश स्तब्ध था। परंतु कुछ ही दिनों के अंतराल के पश्चात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं जनसंघ के कार्यकर्ताओं द्वारा उक्त तानाशाही के विरूद्ध जनजागरण का बीड़ा उठाने पर समस्त देश में सरकार के इस कायरतापूर्ण एवं अवैधानिक कार्य का विरोध करने के लिए सत्याग्रह का रास्ता अपनाया गया, जिसके अंतर्गत सारे देश में लाखों कार्यकर्ताओं ने स्वेच्छा से अपनी गिरफ्तारियां दीं।आपातकाल के गवाह वरिष्ठ भाजपा नेता पलवल निवासियों चन्द्रभान गुप्ता,लोकतन्त्र सेनानी संगठन प्रदेश कार्यकारणी सदस्य शक्तिपाल मंगला, अनिल मोहन मंगला ने आपातकाल की यादों को ताजा करते हुए बताया कि पलवल में भी हरियाणा प्रांत के सबसे बड़े जत्थे ने 31 कार्यकर्ताओं के साथ जनसंघ के वरिष्ठ नेता मूलचंद मंगला के नेतृत्व एवं पलवल में संघ प्रमुख देशभक्त आर्य की प्रेरणा से 14 नवंबर 1975 को पुराना पंजाब नेशनल बैंक, पुरानी अनाज मंडी में गिरफ्तारियां दी गईं। उक्त सभी कार्यकर्ता लगभग अढ़ाई मास की अवधि तक गुडग़ांव कारागार में 31 जनवरी 1976 तक बंदी रहे एवं उनकी रिहाई के आदेश माननीय उच्च न्यायालय पंजाब एंड हरियाणा ने दिनांक 18 जनवरी 1976 को पारित किए। यह स्मरण रहे कि प्रत्येक 14 दिन बाद न्यायालय में पेशी भुगतने के लिए गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को हथकडिय़ों में जकडक़र पलवल लाया जाता था। हम स्वयं भगत सिंह सर्राफ के साथ एक ही हथकड़ी में बंधे हुए सबसे आगे-आगे दो-दो की पंक्तियों में सभी कैदी (कार्यकर्ता) भाइयों के साथ रहते थे। जब हमारे जत्थे को बस से उतारकर सोहना मोड सिटी थाना पुलिस से न्यायालय पैदल ही ले जाया जाता तो हमारे पीछे-पीछे पलवल शहर एवं आसपास के गांवों से सैकड़ों नागरिक भारत माता की जिंदाबाद, इमरजेंसी हटाओ-देश बचाओ एवं इमरजेंसी के तीन दलाल इंदिरा, संजय, बंसीलाल के नारों से आसमान गूंज उठता था। ऐसा लगता था कि पलवल में आपातकाल समाप्त हो गया है। उस समय पलवल में ही अपने एक वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रह्लाद कुमार जिंदल की प्रैस में दर्पण समाचार पत्र छपता था, जिसको बंाटने की जिम्मेदारी ध्रुव चंद बंसल की थी तथा उनको पूरे हरियाणा में समाचार पत्र को बांटने का दायित्व दिया गया था। जिनकेा गिरफ तार करके लगातार 19 महिने मीसा जेल में रखा गया था। इन समाचार पत्रों की दर्जनों प्रतियां हम सत्याग्रही अपने साथ जेल में ले जाते थे। उस समय गुडग़ांव कारावास में हमारे साथ पूर्व मुख्यमंत्री चौ. देवीलाल, वरिष्ठ मंत्री मूलचंद मित्तल, सागरमल गुप्ता भी बंद थे, जो उक्त समाचार पत्र में आपातकाल के विरूद्ध छपी सामग्री को पढऩे के लिए उत्कण्ठ रहते थे तथा सभी सत्याग्रहियों की उनके संघर्ष के लिए प्रशंसा करते थे। जेल में ही एक बार की घटना है, हमसे मिलने हमारे एक सम्बंधी आए तो हम जेलर कार्यालय में रखी काफी कुर्सियों में से दो पर बैठ गए। तभी दनदनाते हुए उपजेलर आए व धमकी भरे स्वर में बोले कि आप कैदी हो, कुर्सियों पर क्यों बैठे हो। मूलचंद मंगला ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए जेल अधिकारियों को चेतावनी दी कि उपजेलर जब तक अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा नहीं मांगेगा तब तक कोई भी सत्याग्रही अन्न जल ग्रहण नहीं करेगा और अंतत: 3 घंटे के अंतराल के बाद उपजेलर को क्षमा मांगनी पड़ी तभी सभी सत्याग्रहियों ने मिलकर अन्न-जल ग्रहण किया। ऐसा था सत्याग्रहियों का मनोबल। जेल के अनेकानेक सस्मरण आज भी हमें गुदगुदी पैदा करते हैं।
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