लखन दास महाराज बनाए गए गद्दी के वारिस

 पलवल जिले के प्रख्यात संत श्री श्री 1008 श्री महंत महामंडलेश्वर सर्वेश्वर दास जी उर्फ सियाराम दास महाराज के गो लोक जाने उपरांत उनकी स्मृति में बाबा मंशाराम धाम अल्लिका में संत समागम एवं विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। जिसमें देश के विभिन्न प्रदेशों से बड़े बड़े संत शिरोमणि एवं विभूतियां  मोनी बाबा कोटवन, ऋषिदास महाराज पंचवटी मंदिर पलवल, भैया जी महाराज बल्लभगढ़, प्रेमदास महाराज कोकिलावन धाम, बिजेंद्र दास कोटा, मोहन दास महाराज अलवर, बेद बिहारी चांदहट, महावीर दास रेवाड़ी, राघव दास गोवर्धन, जयराम दास वृंदावन, सुंदर दास वृंदावन, कृष्ण दास भेड़ौली के अलावा संत समाज से जुड़ी 125 मंडलों की हजारों हस्तियां शामिल हुई और इस अवसर पर सर्वेश्वर दास महाराज के परम शिष्य लखन दास महाराज को चादर ओढ़ाकर उन्हें श्री महंत घोषित किया। इस अवसर पर गांव अल्लिका कैराका ककराली रजाेलका यादूपुर आदि गांवों के समस्त ग्रामीणों के अलावा भारी संख्या में सामाजिक राजनैतिक एवं इलाके के गणमान्य लोगों ने महामंडलेश्वर सर्वेश्वर दास महाराज को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। इस अवसर पर देश के कोने कोने से आए महान संतों ने कहा कि श्री श्री 1008 श्री महंत महामंडलेश्वर सर्वेश्वर दास महाराज का जाना एक अपूरणीय क्षति है जिसको कभी भी पूरा नहीं किया जा सकता एक तरफ जहां उनकी कृपया इस इलाके पर रहती थी वहीं देश भर के संतों को उनका आशीर्वाद मिलता था। उन्होंने ताउम्र ब्रह्मचर्य का पालन कर ठाकुर जी महाराज का स्मरण किया। संत समागम की अध्यक्षता कर रहे मोनी बाबा कोटवन वाले ने संतों और इलाके के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि आज वो चाहे शारीरिक रूप से हमारे बीच में नहीं है लेकिन उनका यश, कीर्ति और मार्गदर्शन यहां आज भी उपस्थित है। मोनी बाबा ने कहा कि महाराज के जाने से हमारी वैष्णव परम्परा की जो क्षति हुई है वह अपूरणीय है लेकिन पूरे संत समाज को आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि उनके परम शिष्य लखन दास महाराज उनकी यश कीर्ति की पताका को उसी तरह फहराते रहेंगे। उन्होंने कहा कि सर्वेश्वर दास महाराज का यशगान जिस तरह पूरे भारत वर्ष में सुनाई पड़ता था आज उससे भी ऊपर बढ़कर उनकी ध्वजा पताका को फहराएंगे। वहीं श्री श्रवेश्वर दास महाराज की गो लोक जाने के बाद उनकी गद्दी के नव घोषित लखन दास महाराज ने कहा कि जिस तरह एक बच्चे के सर से पिता का साया उठ जाने की पीड़ा होती है ऐसे ही एक शिष्य के लिए भी गुरु के जाने पर होती है जो हमेशा पीड़ा उत्पन्न करती है गुरुजी के जाने से मन व्यथित है लेकिन परमात्मा की मर्जी थी गुरुजी मुझे जो जिम्मेवारी देकर गए हैं जो मार्ग उन्होंने दिखाया है अपनी तमाम बस्ती माता को साथ लेकर उनकी यश, कीर्ति को बढ़ाने का काम करूंगा।

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